Property Documents: प्रॉपर्टी खरीदने से पहले चेक करें ये 8 जरूरी दस्तावेज, वरना नहीं मिलेगा मालिकाना हक!
आज के समय में प्रॉपर्टी खरीदना एक बड़ा और जिम्मेदार फैसला होता है। यह न सिर्फ आपकी मेहनत की कमाई का निवेश है, बल्कि आपके भविष्य की सुरक्षा भी इसी पर निर्भर करती है। ऐसे में यदि आपने सावधानी नहीं बरती और जरूरी कागजात की जांच किए बिना सौदा कर लिया, तो भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। हो सकता है, लाखों-करोड़ों की प्रॉपर्टी खरीदने के बाद भी आपको उस पर कानूनी मालिकाना हक न मिले।
इसलिए प्रॉपर्टी खरीदने से पहले कुछ जरूरी दस्तावेजों की गहराई से जांच बेहद आवश्यक होती है। आइए जानते हैं, वे कौन से 8 जरूरी दस्तावेज हैं, जिनकी बिना जांच के प्रॉपर्टी खरीदना एक बहुत बड़ी भूल हो सकती है।
1. बैनामा (Sale Deed): मालिकाना हक का सबसे अहम दस्तावेज
प्रॉपर्टी से जुड़ा सबसे जरूरी डॉक्यूमेंट होता है बैनामा यानी सेल डीड। यह दस्तावेज यह साबित करता है कि आप उस संपत्ति के वैध मालिक हैं। बैनामा एक तरह से कानूनी रूप से स्वामित्व हस्तांतरण का प्रमाण है।
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यह दस्तावेज सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में रजिस्टर्ड होता है।
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बिना इस डॉक्यूमेंट के आप खुद को उस प्रॉपर्टी का मालिक नहीं कह सकते।
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इसमें खरीदार और विक्रेता की डिटेल, कीमत, स्थान, स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्री की तारीख होती है।
सावधानी: नकली बैनामे से बचने के लिए इसकी सत्यता की जांच ज़रूर करें।
2. ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (Occupancy Certificate): कब्जे की वैधता का सबूत
ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट किसी भी संपत्ति पर कब्जे का कानूनी प्रमाण होता है। यह सर्टिफिकेट बिल्डर द्वारा तब जारी किया जाता है जब निर्माण कार्य सारे नियमानुसार पूरे हो चुके होते हैं।
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इसे स्थानीय नगर निगम या नगरपालिका द्वारा जारी किया जाता है।
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यह दर्शाता है कि इमारत रहने के लिए उपयुक्त है और सभी कानूनी प्रावधान पूरे किए गए हैं।
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यदि यह दस्तावेज नहीं है, तो वह प्रॉपर्टी अवैध मानी जा सकती है।
सावधानी: बिना ओसी के प्रॉपर्टी खरीदने से भविष्य में अवैध निर्माण का खतरा हो सकता है।
3. पजेशन लेटर (Possession Letter): कब्जा मिलने की तारीख का प्रमाण
पजेशन लेटर एक और जरूरी दस्तावेज है जो दर्शाता है कि कब आपको प्रॉपर्टी पर कब्जा दिया गया था। यह डिवेलपर की ओर से जारी किया जाता है और इसमें कब्जा देने की तारीख व शर्तें स्पष्ट होती हैं।
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पजेशन लेटर होम लोन लेने के समय बैंक द्वारा भी मांगा जाता है।
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यह दस्तावेज पजेशन और रजिस्ट्रेशन के बीच का पुल होता है।
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इसमें प्रॉपर्टी पर कब्जा देने की डिटेल होती है।
सावधानी: पजेशन लेटर के बिना कब्जा लेना विवाद का कारण बन सकता है।
4. प्रॉपर्टी मोर्गेज पेपर्स: कहीं गिरवी तो नहीं?
कई बार प्रॉपर्टी खरीदते वक्त यह ध्यान नहीं दिया जाता कि कहीं वह पहले से किसी बैंक या संस्था के पास गिरवी तो नहीं रखी गई है।
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मोर्गेज पेपर से यह साफ होता है कि प्रॉपर्टी पर कोई लोन तो बकाया नहीं है।
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यदि प्रॉपर्टी गिरवी है और उसका क्लियरेंस नहीं लिया गया, तो आपको कानूनी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।
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इससे पहले की लोन डिफॉल्ट की स्थिति में बैंक उस प्रॉपर्टी को जब्त कर सकता है।
सावधानी: हमेशा नॉन-इनकम्ब्रेंस सर्टिफिकेट लें जो बताता है कि प्रॉपर्टी पर कोई देनदारी नहीं है।
5. म्यूटेशन डॉक्युमेंट (Mutation of Property): नामांतरण का प्रमाण
म्यूटेशन का मतलब होता है संपत्ति को राजस्व रिकॉर्ड में आपके नाम पर दर्ज करवाना। यह दस्तावेज यह साबित करता है कि रजिस्ट्री के बाद आपने प्रॉपर्टी को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करवा लिया है।
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म्यूटेशन से जमीन पर टैक्स भरने का अधिकार मिलता है।
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यह दिखाता है कि मालिकाना हक वास्तव में आपके पास है।
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विशेषकर जमीन संबंधी लेन-देन में इसका महत्व बहुत अधिक है।
सावधानी: रजिस्ट्री के बाद तुरंत म्यूटेशन करवाना न भूलें।
6. एनओसी (No Objection Certificate): सभी अथॉरिटी से अनुमति जरूरी
प्रॉपर्टी खरीदने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि बिल्डर या विक्रेता ने सभी संबंधित विभागों से एनओसी प्राप्त कर रखी हो।
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जैसे बिजली बोर्ड, जल आपूर्ति, पर्यावरण विभाग, अग्निशमन विभाग आदि।
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एनओसी यह सुनिश्चित करती है कि परियोजना में कोई कानूनी या पर्यावरणीय बाधा नहीं है।
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यह विशेषकर अपार्टमेंट या हाउसिंग प्रोजेक्ट में बेहद जरूरी है।
सावधानी: यदि बिल्डर एनओसी देने से मना करे, तो उसकी विश्वसनीयता पर संदेह करें।
7. अलॉटमेंट लेटर (Allotment Letter): हाउसिंग अथॉरिटी का दस्तावेज
यह दस्तावेज प्रॉपर्टी बुकिंग के समय हाउसिंग अथॉरिटी या डिवेलपर द्वारा जारी किया जाता है। इसमें उस व्यक्ति का नाम होता है जिसे प्रॉपर्टी अलॉट की गई है।
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यह बैंक से होम लोन लेने के लिए अनिवार्य होता है।
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इसमें भुगतान की शर्तें और किस्तों की जानकारी दी होती है।
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यह डिवेलपर द्वारा प्रॉपर्टी अलॉट करने का प्रमाण होता है।
सावधानी: हमेशा मूल अलॉटमेंट लेटर की कॉपी अपने पास रखें।
8. प्रॉपर्टी टैक्स रसीदें: भुगतान का प्रमाण
किसी भी प्रॉपर्टी पर समय-समय पर टैक्स देना होता है। यदि टैक्स बकाया है, तो बाद में प्रॉपर्टी पर जुर्माना या कानूनी कार्यवाही हो सकती है।
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प्रॉपर्टी टैक्स की रसीद यह साबित करती है कि विक्रेता ने सभी टैक्स भर दिए हैं।
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इससे आपको यह जानने में मदद मिलती है कि प्रॉपर्टी पर कोई लंबित देनदारी नहीं है।
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म्युनिसिपल अथॉरिटी से टैक्स रिकॉर्ड की जांच की जा सकती है।
सावधानी: पुराने वर्षों की रसीदें भी जरूर देख लें।
अतिरिक्त सुझाव:
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एग्रीमेंट टू सेल (Agreement to Sale): यह एक प्रारंभिक समझौता होता है जिसमें खरीदार और विक्रेता के बीच शर्तें तय की जाती हैं।
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इनकम टैक्स क्लियरेंस: यदि प्रॉपर्टी की कीमत एक निश्चित सीमा से अधिक है, तो विक्रेता का इनकम टैक्स क्लीयरेंस भी ज़रूरी है।
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एन्हांसमेंट चार्जेस: कभी-कभी बिल्डर छुपे हुए चार्जेस बाद में मांगते हैं, इसलिए सभी चार्जेस का ब्रेकअप लेना जरूरी होता है।
निष्कर्ष:
प्रॉपर्टी खरीदना एक बड़ा फैसला होता है जिसमें भावनाओं से ज्यादा जरूरी होती है समझदारी। अगर आपने जरूरी दस्तावेजों की जांच सही समय पर नहीं की, तो लाखों की प्रॉपर्टी हाथ में होने के बावजूद वह आपकी नहीं हो सकती। ऊपर बताए गए 8 डॉक्युमेंट्स को हमेशा जांचें, वकील की सलाह लें और हर कागज की वैधता सुनिश्चित करें।
ध्यान रखें:
सावधानी हटी, दुर्घटना घटी — यह कहावत प्रॉपर्टी खरीद पर सौ फीसदी लागू होती है।
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